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| मेहनात बिन स्वार्थ |
एक मज़दूर की मजबूरी पैसे कमाने के लिए
इस तस्वीर में ज़मीन पर लेटा एक मज़दूर दिखाई दे रहा है। धूप और धूल भरी ज़मीन पर बिछी एक पतली सी चादर ही उसका आरामगाह है। चेहरे पर थकान साफ़ झलक रही है, और शरीर पर काम की कठोरता की गहरी लकीरें हैं। पास में रखे फावड़ा और गैंती उसके कठिन परिश्रम के गवाह हैं।
यह तस्वीर उस कड़वी सच्चाई को बयान करती है कि अपने परिवार का पेट पालने के लिए एक मज़दूर को कितनी मेहनत करनी पड़ती है। रोज़ कुआं खोदना और रोज़ पानी पीना ही जैसे उसकी ज़िन्दगी का दस्तूर बन गया है। आराम तो जैसे उसके जीवन से कोसों दूर है, पर मजबूरी में वह हर कठिनाई को सहता चला जाता है।
धूप हो या बारिश, ठंड हो या गर्मी, मज़दूर अपनी मेहनत से कभी पीछे नहीं हटता, क्योंकि उसके सपनों से बड़ी उसकी ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। यह तस्वीर न सिर्फ़ उसकी हालत बयान करती है, बल्कि हमें भी सोचने पर मजबूर करती है कि हम ऐसे लोगों की मेहनत की कितनी कदर करते हैं।
"मज़दूर की मजबूरी — मिट्टी में लिखी तक़दीर"
धूप की तल्ख़ तपिश में, पसीने से भीगी मिट्टी पर पड़ा यह मज़दूर,
ना कोई छत, ना बिछावन, बस एक पुरानी चादर — उसके विश्राम की सारी दुनिया।
चेहरे पर थकान नहीं, जैसे समय की स्याही से लिखी मजबूरी की इबारत हो।
शरीर झुक गया है, पर हौसला अब भी अधमरा नहीं।
क्योंकि भूख इंतज़ार नहीं करती, और बच्चों की मुस्कान उधार नहीं मिलती।
हर दिन सूरज के साथ उठता है यह मज़दूर,
हाथ में फावड़ा, दिल में हौसला और आँखों में बस एक ही सपना —
कि शायद आज की मेहनत कल को थोड़ा आसान बना दे।
मिट्टी में पसीना बहाकर भी वह जानता है कि यह पसीना ही उसकी पूंजी है।
जहाँ दूसरे लोग सपनों के पीछे भागते हैं,
यह आदमी सपनों को छोड़, हक़ीक़त का बोझ ढोता है।
थोड़ी देर की थकान मिटाने के लिए, खुली ज़मीन पर लेटना,
और उसी धरती को अपनी माँ समझकर विश्राम करना,
यही तो उसकी सबसे बड़ी नियति है।
सपने उसके भी होते हैं — शायद एक दिन अपने बच्चों को स्कूल भेजेगा,
शायद एक दिन छत के नीचे सो पाएगा,
पर आज नहीं, आज उसे फिर उठना होगा।
क्योंकि मज़दूरी रुकी तो चूल्हा भी बुझ जाएगा।
यह तस्वीर चीख़-चीख़ कर कहती है —
"थक गया हूँ मालिक, पर रुक नहीं सकता।
पेट की आग से बड़ी कोई आग नहीं होती।
जिस दिन पेट भरा होगा, उस दिन चैन से ज़रूर सोऊँगा,
पर आज नहीं... आज मुझे फिर मिट्टी में अपने सपनों को बोना है।"
1. साधारण रूप में:
"पैसे के लिए मज़दूरी करना मज़दूर की सबसे बड़ी मजबूरी है।"
2. भावनात्मक अंदाज़ में:
"पेट की आग बुझाने के लिए, मज़दूरी करना उसकी मजबूरी बन जाती है।"
3. गहरा और सोचने वाला:
"जब जेब खाली हो और ज़िंदगी के खर्च भारी, तब मज़दूरी मजबूरी नहीं, ज़रूरत बन जाती है।"
4. शायरी जैसी पंक्तियाँ:
"चाहे धूप हो या हो सर्दी की ठंडी हवा,
पैसे के लिए मज़दूरी करना उसकी मजबूरी बना रहा।"
5. एक दमदार स्लोगन:
"मज़दूरी उसकी मजबूरी है, क्योंकि ज़िंदगी की ज़रूरतें कभी खत्म नहीं होतीं।"

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